Fateha on food…some verses of the Quran…Only Allah subhanahuwatala name is allowed…Nothing else.

‘He hath only forbidden you dead meat, and blood, and the flesh of swine, and that on which any other name hath been invoked besides that of Allah. But if one is forced by necessity, without wilful disobedience, nor transgressing due limits,- then is he guiltless. For Allah is Oft-forgiving Most Merciful.’ Al-Quran (2:173)

अल-बक़रा (Al-Baqarah):173 – उसने तो तुमपर केवल मुर्दार और ख़ून और सूअर का माँस और जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। इसपर भी जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करनेवाला न हो और न सीमा से आगे बढ़नेवाला हो तो उसपर कोई गुनाह नहीं। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है

‘They ask thee what is lawful to them (as food). Say: lawful unto you are (all) things good and pure: and what ye have taught your trained hunting animals (to catch) in the manner directed to you by Allah: eat what they catch for you, but pronounce the name of Allah over it: and fear Allah; for Allah is swift in taking account.’ Al-Quran (5:4)

अल-माइदा (Al-Ma’idah):4 – वे तुमसे पूछते है कि "उनके लिए क्या हलाल है?" कह दो, "तुम्हारे लिए सारी अच्छी स्वच्छ चीज़ें हलाल है और जिन शिकारी जानवरों को तुमने सधे हुए शिकारी जानवर के रूप में सधा रखा हो – जिनको जैस अल्लाह ने तुम्हें सिखाया हैं, सिखाते हो – वे जिस शिकार को तुम्हारे लिए पकड़े रखे, उसको खाओ और उसपर अल्लाह का नाम लो। और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह जल्द हिसाब लेनेवाला है।"

‘Eat not of (meats) on which Allah’s name hath not been pronounced: That would be impiety. But the evil ones ever inspire their friends to contend with you if ye were to obey them, ye would indeed be Pagans.’ Al-Quran (6:121)

अल-अनआम (Al-‘An`am):121 – और उसे न खाओं जिसपर अल्लाह का नाम न लिया गया हो। निश्चय ही वह तो आज्ञा का उल्लंघन है। शैतान तो अपने मित्रों के दिलों में डालते है कि वे तुमसे झगड़े। यदि तुमने उनकी बात मान ली तो निश्चय ही तुम बहुदेववादी होगे

‘Say: "I find not in the message received by me by inspiration any (meat) forbidden to be eaten by one who wishes to eat it, unless it be dead meat, or blood poured forth, or the flesh of swine,- for it is an abomination – or, what is impious, (meat) on which a name has been invoked, other than Allah’s". But (even so), if a person is forced by necessity, without wilful disobedience, nor transgressing due limits,- thy Lord is Oft-forgiving, Most Merciful.’ Al-Quran (6:145)

अल-अनआम (Al-‘An`am):145 – कह दो, "जो कुछ मेरी ओर प्रकाशना की गई है, उसमें तो मैं नहीं पाता कि किसी खानेवाले पर उसका कोई खाना हराम किया गया हो, सिवाय इसके लिए वह मुरदार हो, यह बहता हुआ रक्त हो या ,सुअर का मांस हो – कि वह निश्चय ही नापाक है – या वह चीज़ जो मर्यादा से हटी हुई हो, जिसपर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो। इसपर भी जो बहुत विवश और लाचार हो जाए; परन्तु वह अवज्ञाकारी न हो और न हद से आगे बढ़नेवाला हो, तो निश्चय ही तुम्हारा रब अत्यन्त क्षमाशील, दयाबान है।"

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